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Showing posts from August, 2020

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से चतुर्थ ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर है। यह मध्य प्रदेश के शिवपुरी में स्थित है। यहाँ दो ज्योतिर्लिंगों की पूजा की जाती है। ओंकारेश्वर और अमलेश्वर। शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता के 18 अध्याय में इसका वर्णन मिलता है। यही केवल एक ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि ये तट ॐ के आकार का है। यहाँ प्रतिदिन अहिल्याबाई होल्कर की तरफ से मिट्टी से निर्मित 18 शिवलिंग तैयार करके नर्मदा नदी में विसर्जित किये गए हैं। मंदिर की इमारत पांच मंजिला है। यह ज्योतिर्लिंग पंचमुखी है। लोगों का मानना है कि भगवान शिव तीनों लोको का भ्रमण करके यहाँ विश्राम करते हैं। तभी रात्रि में यहाँ शिव भगवान जी की शयन आरती की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भक्तगणों के सारे संकट यहाँ दूर हो जाते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि आप चाहे सारे तीर्थ कर लें लेकिन ओंकारेश्वर के दर्शन करे बिना अधूरे हैं। इसीलिए भक्तगण दूर-दूर से यहाँ भारी संख्या में आते हैं। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास व कहानी एक बार नारद जी भ्रमण करते हुए विंध्याचल पर्वत प...

पदमा / जल झुलनी एकादशी

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  पदमा / जल झूलनी / वामन एकादशी   हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार , भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहते हैं। इसे परिवर्तिनी एकादशी पदमा एकादशी , वामन एकादशी एवं डोल ग्यारस आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान वामन की पूजा की जाती है। कुछ स्थानों पर ये दिन भगवान श्रीकृष्ण की सूरज पूजा (जन्म के बाद होने वाला मांगिलक कार्यक्रम) के रूप में मनाया जाता है। इस एकादशी का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। कहा जाता है कि स्वर्ग के देवी-देवता भी इस एकादशी पर व्रत रखते हैं। पद्मा एकादशी को परिवर्तनी एकादशी भी कहा जाता है। भगवान विष्णु चातुर्मास के चार माह वामन रूप में पाताल लोक में निवास करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु शेष शैय्या पर करवट बदलते हैं। इस एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है। पद्मा एकादशी के दिन दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस एकादशी के दिन व्रत रखने से भूमि दान एवं गोदान से भी अधिक पुण्यफल प्राप्त होता है। जो मनुष्य मोक्ष की अभिलाषा करता है , उसे पद्मा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।   महत्त्व...

महाकाल ज्योतिर्लिंग

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महाकाल ज्योतिर्लिंग   देश के अलग-अलग भागों में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से सबसे खास है श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक कहा गया है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन , पूजन , आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप समाप्त हो जाते हैं। वे भगवान शिव की कृपा के पात्र बनते हैं। यह परम पवित्र ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में है। पौराणिक कथाओं के अनुसार उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन का राज था। वह भगवान शिव के परम भक्त थे और शिवगुणों में मुख्य मणिभद्र नामक गण राजा चंद्रसेन के मित्र थे। एक बार राजा के मित्र मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक चिंतामणि प्रदान की जोकी बहुत ही तेजोमय थी। राजा चंद्रसेन ने मणि को अपने गले में धारण कर लिया , लेकिन मणि को धारण करते ही पूरा प्रभामंडल जगमगा उठा और इसके साथ ही दूसरे देशों में भी राजा की यश-कीर्ति बढ़ने लगी। राजा के प्रति सम्मान और यश देखकर अन्य राजाओं ने मणि को प्राप्त करने के लिए की प्रयास किए , लेकिन मणि राजा की अत्यंत प्रिय थी। इस कारण से राजा ने किसी को मणि नहीं दी। इसलिए राजा द्वारा मणि न द...

श्री गजानन उत्सव

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  गणेशजी आए हैं खुशियाँ लाए है आइए जानते हैं गणेशजी के बारे में कुछ रोचक बातें भगवान गणेश को भगवान शिव और माता पार्वती की दूसरी संतान मानी जाती है।शिवपुराण के अनुसार, भगवान गणेश को बनाने के लिए पार्वती के सहेलियां जया और विजया ने निर्णय लिया था। उन्होंने पार्वती को सुझाव दिया था कि वह नंदी और शिव भगवान के निर्देशों का पालन करें। इसलिए यहां एक ऎसा व्यक्ति होना चाहिए जो पार्वती के आदेशों का भी पालन करें। इसके बाद पार्वती ने अपने शरीर के मैल से भगवान गणेश को बनाया। गणों के स्वामी होने के कारण ही इन्हें 'गणपति' कहते हैं। हाथी जैसा मुंह होने की वजह से इनका नाम 'गजानन' है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जब परशुराम कैलाश पर्वत पर शिव भगवान से मिलेने गए थे। वह ध्यान में थे तो भगवान गणेश जी ने उन्हे रोका तो परशुराम जी ने नाराज होकर गणेश पर कुल्हाड़ी से वार किया जो शिव भगवान द्वारा ही दी गई थी। जिसका वार कभी खाली नहीं जाता था। इस हमले के दौरान भगवान गणेश का एक दांत टूट गया इसलिए गणेश जी को एकदन्त के रूप में जाना जाता है। हर युग में गणेश भगवान के अलग-अलग रूप की आराधना की गई है....

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग श्रावण मास भोलेनाथ का सबसे प्रिय महीना है। इस दौरान शिव की आराधना की जाती है। श्रावण मास में भोले शंकर की अगर पूरी श्रद्धा से अर्चना की जाए तो भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कहते हैं अगर आप भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करते हैं तो आपको शुभ फल प्राप्त होता है। वहीं , आज हम आपको दूसरे ज्योतिर्लिंग यानी मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के बारे में बताएंगे। यह  ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश के   दक्षिणी भाग में श्रीशैलम पर्वत पर कृष्णा नदी के तट पर स्थित हैं । कहा जाता है कि यहां महादेव मां पार्वती के साथ विराजते हैं। : 1:50   शिवपुराण के अनुसार , यह कथा शिव जी के परिवार से जुड़ी हुई है। भगवान शिव के छोटे पुत्र गणेश जी , कार्तिकेय से पहले विवाह करने चाहते थे। जब यह बात शिव जी और माता पार्वती को पता चली तो उन्होंने इस समस्या को सुलझाने के बारे में विचार किया। उन्होंने दोनों के सामने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि दोनों में से जो कोई भी पृथ्वी की पूरी परिक्रमा कर पहले लौटेगा उनका विवाह पहले कराया जाएगा। जैसे ही कार्तिकेय ने यह बात सुनी वो पृथ्वी की ...

अजा एकादशी व्रत कथा

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अजा एकादशी का महत्त्व अर्जुन ने कहा: हे पुण्डरिकाक्ष! मैंने श्रावण शुक्ल एकादशी अर्थात पुत्रदा एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब आप कृपा करके मुझे भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसके व्रत का क्या विधान है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है? श्रीकृष्ण ने कहा: हे कुन्ती पुत्र! भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं। इसका व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलोक और परलोक में मदद करने वाली इस एकादशी व्रत के समान संसार में दूसरा कोई व्रत नहीं है। अजा एकादशी व्रत कथा अब ध्यानपूर्वक इस एकादशी का माहात्म्य श्रवण करो: पौराणिक काल में भगवान श्री राम के वंश में अयोध्या नगरी में एक चक्रवर्ती राजा हरिश्चन्द्र नाम के एक राजा हुए थे। राजा अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रसिद्घ थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्ववामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। सुबह विश्वामित्र वास...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

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  श्री कृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म में अब त्योहारों का सिलसिला शुरू हो चुका है। रक्षा बंधन के आठ दिन बाद जन्माष्टमी मनाई जाती है ,यानी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं। पृथ्वी पर कई भगवान और देवों ने मानव रुप में जन्म लिया है। उनमें से एक विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने भी जन्म लिया। श्री कृष्ण के बाल्य काल के नटखट अंदाज और लीलाएं सबका मन मोह लेती है। कारागार में भगवान श्री कृष्ण का जन्म- श्री कृष्ण का जन्म उनके ही मामा के कारागार में हुआ था। दरअसल कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी राजा से हुआ था। एक समय जब वो अपनी बहन को लेकर जा रहा था तभी आकाशवाणी हुई की देवकी औऱ वासुदेव की आठवी संतान कंस की मृत्यु का कारण बनेगा। इससे कंस बहुत घबरा गया और उसने उन दोनो का वध करने की ठान्ली पर वहां पर मौजुद एक ऋषी ने कहा अपनी मौत से इतना डरते हो क्या, अगर नहीं, तो इन्हे मारने से तुम्हे कुच हासिल नही होगा। हिम्मत रखते हो तो अपना भविष्य बदल के दिखाओ, तो उसने अपनी बहन और उसके पति वासुदेव को जंजीरों में जकड़ कर कारागार में डाल दिया। इसके बाद वासुदेव और दवकी को...

श्री सोमनाथ महादेव मंदिर की कथा

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  श्री सोमनाथ महादेव मंदिर गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में यह ज्योतिर्लिंग स्थापित है। पहले यह क्षेत्र प्रभासक्षेत्र के नाम से जाना जाता था। यहीं भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने जरा नामक व्याध के बाण को निमित्त बनाकर अपनी लीला का संवरण किया था। यहां के ज्योतिर्लिंग की कथा का पुराणों में इस प्रकार से वर्णन है- दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का समस्त अनुराग व प्रेम उनमें से केवल रोहिणी के प्रति ही रहता था। उनके इस कृत्य से दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याएं बहुत अप्रसन्न रहती थीं। उन्होंने अपनी यह व्यथा-कथा अपने पिता को सुनाई। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया।  किंतु रोहिणी के वशीभूत उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः दक्ष ने कुद्ध होकर उन्हें 'क्षयग्रस्त' हो जाने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा-शीतलता वर्षण का उनका सारा कार्य रूक गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। ...

रक्षाबंधन

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खूब खुशियां खिल उठेंगी राखी के त्यौहार पे जब बहना बांधेगी राखी अपने भाई के हाथ पे आइये जानते हैं क्यों मानते है हम राखी का त्यौहार  रक्षाबंधन पूरे विश्व में हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । यह त्योहार भाई और बहनों के बीच प्यार , देखभाल और स्नेह के सुंदर संबंधों को दर्शाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई के चारों तरफ एक धागे को सुरक्षा के प्रतीक के रूप में बांधती है , और वह उसकी रक्शा और ख्याल रखने का वादा करता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार हजारों साल राखी बांधने का प्रचलन शुरू हुआ था। सबसे पहली राखी या रक्षासूत्र राजा बलि को बांधा गया था। उन्हें मां लक्ष्मी ने रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बनाया था। राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयास किया तो देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से भिक्षा में तीन पग जमीन मांगी। भगवान ने दो पग में ही पूरी धरती और आकश नाप लीया और फिर तीसरा पग देने के लिए तब राजा बलि से कहा। इस पर राजा ब...