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शीतला सप्तमी की कथा

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 देश के तमाम हिस्सों में महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ शीतला सप्तमी मनाई जाती है। घरों को शुद्ध और पवित्र करते हुए एक रात पहले तैयार किये गए ठंडे खाने का भोग लेकर महिलाएं प्रातः काल से ही शीतला माता मंदिर में पहुंचने लगती है। महिलाओं में शीतला माता की पूजा अर्चना को लेकर काफी उल्लास देखा जाता है। पूजा अर्चना के दौरान महिलाओं द्वारा 'हृं श्रीं शीतलायै नमः' मंत्र का मन में उच्चारण किया गया।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माँ शीतला को ठन्डे भोजन का भोग इसी मान्यता के अनुरूप लगाया जाता है। कथा इस प्रकार है.... एक बार शीतला सप्तमी के दिन एक परिवार में बूढ़ी औरत और उनकी दो बहुओं ने शीतला माता का व्रत रखा। मान्यता के अनुसार इस दिन सिर्फ बासी भोजन ही खाया जाता है, इसी वजह से रात को ही माता का भोग सहित अपने लिए भी भोजन बना लिया। लेकिन बूढ़ी औरत की दोनों बहुओं ने ताज़ा खाना बनाकर खा लिया। क्योंकि हाल ही में उन दोनों को संतान हुई थीं, इस वजह से दोनों को डर था कि बासी खाना उन्हें नुकसान ना करे। यह बात उनकी सास को मालूम चली कि दोनों ने ताज़ा खाना खा लिया, इस बात को जान वह नाराज हुई। थोड़ी देर बा...

मत्स्य अवतार

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श्री विष्णु मत्स्य अवतार  मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जंतु एकत्रित करने के लिए कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुन: जीवन का निर्माण किया। एक दूसरी मान्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुराकर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुन: स्थापित किया। एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया? कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी थ...

भाई दुज

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 हिंदूओं के प्रमुख त्योहार में भाईदूज का भी बहुत महत्व है। भाईदूज का पर्व दीपावली से 2 दिन बाद आता है, इस दिन बहन अपने भाई को तिलक कर उसकी लंबी उम्र के लिए हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना भी करती हैं। स्कंदपुराण में लिखा है कि इस दिन यमराज को प्रसन्न करने से पूजन करने वालों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इसको मनाए जाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। यम-यमुना की कहानी शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य नारायण और संज्ञा के दो संतानें- एक पुत्र यमराज और दूसरी पुत्री यमुना थी। मगर एक समय ऐसा आया जब संज्ञा सूर्य का तेज सहन कर पाने में असमर्थ होने के कारण उत्तरी ध्रुव में छाया बनकर रहने लगी। जिसके कारण ताप्ती नदी और शनिदेव का जन्म हुआ। उत्तरी ध्रुव में बसने के बाद संज्ञा (छाया) का यम व यमुना के साथ व्यवहार में अंतर आ गया। इससे व्यथित होकर यम ने अपनी नगरी यमपुरी बसाई। वहीं यमुना अपने भाई यम को यमपुरी में पापियों को दंड देते देख दु:खी होती, इसलिए वह गोलोक में निवास करने लगीं लेकिन यम और यमुना दोनों भाई-बहन में बहुत स्नेह था। इसी तरह समय व्यतीत होता रहा, फिर अचानक एक दिन यम को अपनी ब...

गोवर्धन पूजा

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दीपावली के एक दिन बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट का महोत्सव मनाया जाता है। इस दिन गोवर्धन और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इसके साथ ही गाय और नंदी की पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण की विजय का जश्न मनाने के लिए मनाई जाती है, जब उन्होंने इंद्र को हराया था। मथुरा-वृंदावन, गोवर्धन और ब्रज क्षेत्र में तो यह उत्‍सव व‍िशेष धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन नए अनाज का शुभारंभ भगवान को भोग लगाकर किया जाता है। मुख्य मंदिरों में कढ़ी-चावल, खीर, मिठाईयां, पुवा, पूड़ी आदि बनाई जाती है। गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाने के बाद अन्नकूट को अलग-अलग बांटने की बजाय इकट्ठा बांटा जाता है। इस मिश्रण का स्वाद बहुत अच्छा होता है। महाराष्ट्र में यह दिन बालि प्रतिपदा या बालि पड़वा के रूप में मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा क्‍यों की जाती है? पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में, भगवान कृष्ण ने गोकुल के लोगों को इंद्र की पूजा करने से रोका, क्योंकि वे अपनी फसलों के लिए वर्षा के लिए देवराज इंद्र पर निर्भर थे। भगवान कृष्ण ने उन्हें समझाया कि वे...

कजरी तीज

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कजरी तीज का मुख्य उद्देश्य देवी पार्वती और भगवान शिव के मिलन का उत्सव मनाना है। इस दिन महिलाएं विशेष व्रत रखती हैं और भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं। रक्षा बंधन पर्व के तीसरे दिन सुहागिनों का सौंधा-सा पर्व कजरी तीज या कजरी तीज आता है। इस मौसम में तीज व्रत मनाने का अवसर तीन बार आता है। ये तीनों तीज हरियाली तीज, कजरी (कजली) तीज व हरतालिका तीज धूमधाम से मनाई जाती है कजरी तीज भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण तीन तीजों में से एक है, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में धूमधाम से मनाई जाती है। यह त्योहार महिलाओं द्वारा भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने के लिए मनाया जाता है, जिसमें वे अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी इस दिन मनपसंद वर के लिए उपवास करती हैं। कजरी तीज क्यों मनाई जाती है? कजरी तीज का मुख्य उद्देश्य देवी पार्वती और भगवान शिव के मिलन का उत्सव मनाना है। इस दिन महिलाएं विशेष व्रत रखती हैं और भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं। इस त्योहार को मनाने के पीछे यह मान...

गंगा दशहरा

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  गंगा दशहरा पर अद्भुत संयोग, रवि योग, सर्वार्थ व अमृत योग के शुभ संयोग ।  आइए जानते हैं गंगा दशहरा पर मां गंगा की पूजा कैसे करना रहेगा शुभ- गंगा दशहरा पर जातक कैसे करें पूजा-पाठ और दान गंगा दशहरा का पवन पर्व है। रवि योग, सर्वार्थ व अमृत योग के शुभ संयोग में त्योहार मनाया जाएगा। गंगा दशहरा पर मां गंगा की पूजा-अर्चना करने, गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान, दान, पुण्य का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा भागीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थीं। मां गंगा की पूजा-अर्चना से दुख-पापों से मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं गंगा दशहरा का महत्व, पूजा विधि, मुहूर्त, मंत्र  गंगा दशहरा पर दान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और जीवन के ग्रह दोष खत्म होते हैं। संत तुलसी दास जी ने भी कलयुग में सद्गति के लिये भगवान श्रीराम और देव नदी गंगा के पवित्र जल को ही आधार माना है। गंगा दशहरा क्यों मनाते हैं? मां गंगा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से धरती पर अवतरित...

मकर संक्रांति त्यौहार और संस्कृति

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  भारतवर्ष में प्रतिदिन कोई ना कोई त्यौहार अवश्य मनाया जाता है. प्रत्येक त्यौहार सिर्फ एक परंपरा नहीं है परंतु उन्हें मनाए जाने का प्रामाणिक वैज्ञानिक कारण भी उपलब्ध है. प्रतिवर्ष जनवरी माह में मकर सक्रांति ( Makar Sankranti) का उत्सव मनाया जाता है. मकर सक्रांति का यह फलसफा है भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है. जैसे खिचड़ी (बिहार और उत्तर प्रदेश में) , लोहड़ी , पिहू और पोंगल.   पौष माह में जब सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. तब हिंदू धर्म का यह पर्व मकर सक्रांति के रूप मनाया जाता है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपनी उत्तरायणी गति प्रारंभ करता है. इसलिए इस पर वह को उत्तरायणी पर्व भी कहा जाता है. भगवान शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं और इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं इस दिन जप , तप , ध्यान और धार्मिक क्रियाकलापों का अधिक महत्व होता हैं. इसे फसल उत्सव भी कहा जाता हैं.   इस दिन से पहले सूर्य पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध पर सीधी किरणें डालता है. जिसके कारण उत्तरी गोलार्ध में रात्रि बड़ी और दिन छोटा होत...