Posts

Showing posts from November, 2020

देव प्रबोदिनी एकादशी / तुलसी विवाह

Image
देव प्रबोदिनी एकादशी / तुलसी विवाह आषाढ़ शुक्ल एकादशी की तिथि को देवशयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन उठते हैं इसलिए इसे देवोत्थान (देवउठनी) एकादशी भी कहते हैं। कहा जाता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को 4 माह के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। 4 महीने पश्चात वे कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। विष्णुजी के शयनकाल के 4 माह में विवाह आदि अनेक मांगलिक कार्यों का आयोजन निषेध है। हरि के जागने के पश्चात यानी भगवान विष्णु के जागने बाद ही सभी मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। पौराणिक कथा- एक बार भगवान विष्णु से उनकी प्रिया लक्ष्मीजी ने आग्रह के भाव में कहा- हे भगवान! अब आप दिन-रात जागते हैं, लेकिन एक बार सोते हैं तो फिर लाखों-करोड़ों वर्षों के लिए सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं इसलिए आप नियम से विश्राम किया कीजिए। लक्ष्मीजी की बात भगवान को उचित लगी। उन्होंने कहा कि तुम ठीक कहती हो। मेरे जागने से सभी देवों और खासकर तुम्हें कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से वक्त नहीं मिलता इसलिए आज से मैं हर वर्ष 4 मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। मेरी यह निद्रा...

रमा एकादशी

Image
रमा एकादशी इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माता लक्ष्मी का नाम रमा है, इसलिए यह एकादशी उनके ही नाम पर है। रमा एकादशी के दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की पूजा करने से सुख समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, पापों का नाश होता है। आज के दिन जो लोग रमा एकादशी का व्रत रखते हैं, उनको रमा एकादशी की कथा सुननी चाहिए। इसके बिना व्रत पूरा नहीं होता है। रमा एकादशी व्रत कथा एक समय मुचुकुंद नाम का राजा सत्यवादी तथा विष्णुभक्त था। उसने अपनी बेटी चंद्रभागा का विवाह उसने राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से किया था। मुचुकुंद एकादशी का व्रत विधि विधान से करता था और प्रजा भी व्रत के नियमों का पालन करती थी। कार्तिक मास में सोभन एक बार ससुराल आया। रमा एकादशी का व्रत था। राजा ने घोषणा कर दी कि सभी लोग रमा एकादशी का व्रत नियम पूर्वक करें। चंद्रभागा को लगा ​कि उसके पति को इससे पीड़ा होगी क्योंकि वह कमजोर हृदय का है। जब सोभन ने राजा का आदेश सुना तो पत्नी के पास आया और इस व्रत से बचने का उपाय पूछा। उसने कहा कि यह व्रत करने से वह मर जाएगा। इस पर चंद्रभागा ने कहा कि इस राज्य में र...

जय बाबा पशुपतिनाथ

Image
जय बाबा पशुपतिनाथ नेपाल में भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर विश्वभर में विख्यात है। इसका असाधारण महत्त्व भारत के अमरनाथ व केदारनाथ से किसी भी प्रकार कम नहीं है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ के दर्शन के लिए भारत के ही नहीं, अपितु विदेशों के भी असंख्य यात्री और पर्यटक काठमांडू पहुंचते हैं।  पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप ...

जय घृष्णेश्वर महादेव।

Image
जय घृष्णेश्वर महादेव शिवलिंग  के रूप में भगवान शिव जहां भी विराजमान हुए, वह प्रसिद्ध तीर्थस्थलों के रूप में जाने जाते हैं। वैसे तो शिव के अनगिनत शिवलिंग जगह-जगह स्थापित हैं लेकिन इनमें से 12 शिवलिगों को दिव्य ज्योतिर्लिंग का महत्व दिया जाता है। शिव के इन्हीं 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग। हिंदू धर्म में  घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग को अंतिम ज्योतिर्लिंग का दर्जा प्राप्त है। बाकी 11 ज्योतिर्लिंगों की तरह शिव के अंतिम ज्योतिर्लिंग घुष्मेश्वर की महिमा अपरमपार है। शिवमहापुराण में भी घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख है। मान्यता है कि घुष्मेश्वर में आकर शिव के इस स्वरूप के दर्शन से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती हैं। आइए जानते हैं इस अंतिम ज्योतिर्लिंग की कहानी और यहां की खास बातें। महाराष्ट्र राज्य के दौलताबाद में वेरुलगांव में घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। मंदिर को घृष्णेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर अजंता और एलोरा की गुफाओं के निकट स्थित है। यह शिवलिंग शिव की अपार भक्त रही घुष्मा की भक्ति का स्वरूप है। उसी के न...