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गंगा दशहरा

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  गंगा दशहरा पर अद्भुत संयोग, रवि योग, सर्वार्थ व अमृत योग के शुभ संयोग ।  आइए जानते हैं गंगा दशहरा पर मां गंगा की पूजा कैसे करना रहेगा शुभ- गंगा दशहरा पर जातक कैसे करें पूजा-पाठ और दान गंगा दशहरा का पवन पर्व है। रवि योग, सर्वार्थ व अमृत योग के शुभ संयोग में त्योहार मनाया जाएगा। गंगा दशहरा पर मां गंगा की पूजा-अर्चना करने, गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान, दान, पुण्य का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा भागीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थीं। मां गंगा की पूजा-अर्चना से दुख-पापों से मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं गंगा दशहरा का महत्व, पूजा विधि, मुहूर्त, मंत्र  गंगा दशहरा पर दान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और जीवन के ग्रह दोष खत्म होते हैं। संत तुलसी दास जी ने भी कलयुग में सद्गति के लिये भगवान श्रीराम और देव नदी गंगा के पवित्र जल को ही आधार माना है। गंगा दशहरा क्यों मनाते हैं? मां गंगा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से धरती पर अवतरित...

मकर संक्रांति त्यौहार और संस्कृति

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  भारतवर्ष में प्रतिदिन कोई ना कोई त्यौहार अवश्य मनाया जाता है. प्रत्येक त्यौहार सिर्फ एक परंपरा नहीं है परंतु उन्हें मनाए जाने का प्रामाणिक वैज्ञानिक कारण भी उपलब्ध है. प्रतिवर्ष जनवरी माह में मकर सक्रांति ( Makar Sankranti) का उत्सव मनाया जाता है. मकर सक्रांति का यह फलसफा है भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है. जैसे खिचड़ी (बिहार और उत्तर प्रदेश में) , लोहड़ी , पिहू और पोंगल.   पौष माह में जब सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. तब हिंदू धर्म का यह पर्व मकर सक्रांति के रूप मनाया जाता है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपनी उत्तरायणी गति प्रारंभ करता है. इसलिए इस पर वह को उत्तरायणी पर्व भी कहा जाता है. भगवान शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं और इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं इस दिन जप , तप , ध्यान और धार्मिक क्रियाकलापों का अधिक महत्व होता हैं. इसे फसल उत्सव भी कहा जाता हैं.   इस दिन से पहले सूर्य पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध पर सीधी किरणें डालता है. जिसके कारण उत्तरी गोलार्ध में रात्रि बड़ी और दिन छोटा होत...

अधिक मास / पुरषोत्तम मास में क्या करना चाहिए और क्या नहीं

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 मंगलवार 18 जुलाई से अधिक मास शुरू हो जाएगा. इसे मलमास और पुरुषोत्तम मास कहा जाता है इस बार 19 साल बाद सावन महीने में अधिक मास आया है. इस महीने में भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा करें, ग्रंथों का पाठ करें और दान-पुण्य करें.  अधिक मास में क्या करें क्या नहीं करना चाहिए- क्या करें:- 1. इस मास की कथा भगवान विष्णु के अवतार नृःसिंह भगवान और श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है। इस माह में उक्त दोनों भगवान का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। 2. इस मास में श्रीमद्भागवत गीता में पुरुषोत्तम मास का महामात्य, श्रीराम कथा वाचन, विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र पाठ का वाचन और गीता के पुरुषोत्तम नाम के 14वें अध्याय का नित्य अर्थ सहित पाठ करना चाहिए।  3. पाठ नहीं कर सकते हैं तो भगवान के 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्र का प्रतिदिन 108 बार जप करना चाहिए। 4. शिवजी की विश्व पूजा अर्चना करनी चाहिए शिव अभिषेक करना चाहिए, शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए, 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करना चाहिए । 5. इस पूरे मास एक समय ही भोजन करना चाहिए जो कि आध्यात्मिक और सेहत की दृष्टि से उत्तम होगा।  भोजन में गेहूं, चावल, जौ,...

अधिक मास / पुरषोत्तम मास की कथा

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    मंगलवार 18 जुलाई से अधिक मास शुरू हो जाएगा. इसे मलमास और पुरुषोत्तम मास कहा जाता है इस बार 19 साल बाद सावन महीने में अधिक मास आया है. इस महीने में भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा करें, ग्रंथों का पाठ करें और दान-पुण्य करें. जानिए पुरषोत्तम मास की कथा 1.कहते हैं कि दैत्याराज हिरण्यकश्यप ने अमर होने के लिए तप किया ब्रह्माजी प्रकट होकर वरदान मांगने का कहते हैं तो वह कहता है कि आपके बनाए किसी भी प्राणी से मेरी मृत्यु ना हो, न मनुष्य से और न पशु से। न दैत्य से और न देवताओं से। न भीतर मरूं, न बाहर मरूं। न दिन में न रात में। न आपके बनाए 12 माह में। न अस्त्र से मरूं और न शस्त्र से। न पृथ्‍वी पर न आकाश में। युद्ध में कोई भी मेरा सामना न करे सके। आपके बनाए हुए समस्त प्राणियों का मैं एकक्षत्र सम्राट हूं। तब ब्रह्माजी ने कहा- तथास्थु। 2. फिर जब हिरण्यकश्यप के अत्याचार बढ़ गए और उसने कहा कि विष्णु का कोई भक्त धरती पर नहीं रहना चाहिए तब श्री‍हरि की माया से उसका पुत्र प्रहलाद ही भक्त हुआ और उसकी जान बचाने के लिए प्रभु ने सबसे पहले 12 माह को 13 माह में बदलकर अधिक मास बनाया। इसके बाद उन्ह...

अधिक मास / पुरषोत्तम मास की गणना

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 जानिए अधिक मास की पूरी कहानी  सवाल जवाब की श्रृंखला में आज से अधिक मास शुरू; 3 साल में बढ़ता है एक महीना, कैसे तय होता है कब आएगा ये महीना अधिक मास को भगवान विष्णु ने अपना नाम पुरुषोत्तम दिया है। इस कारण पुरुषोत्तम मास में विष्णु पूजा करने की परंपरा है। अधिक मास को भगवान विष्णु ने अपना नाम पुरुषोत्तम दिया है। इस कारण पुरुषोत्तम मास में विष्णु पूजा करने की परंपरा है। आज (मंगलवार, 18 जुलाई) से सावन महीने का अधिक मास शुरू हो गया है। ये महीना 16 अगस्त तक रहेगा, इसके बाद सावन का कृष्ण पक्ष शुरू होगा। इस बार 19 साल बाद सावन में अधिक मास आया है। हिन्दी पंचांग के इस अतिरिक्त महीने की वजह से संवत्-2080 13 महीनों का है। सवालों में जानिए ये अधिक मास क्या है, क्यों आता है, अगर अधिक मास न हो तो क्या होगा और इस महीने में पूजा-पाठ से जुड़े कौन-कौन से काम किए जा सकते हैं...  अंग्रेजी कैलेंडर में लीप ईयर होता है और हिन्दी पंचांग में अधिक मास। लीप ईयर में सिर्फ एक दिन बढ़ता है, जबकि अधिक मास से हिन्दी वर्ष में पूरा एक महीना बढ़ जाता है। दरअसल, ये सौर वर्ष और चंद्र वर्ष की वजह से होता है।...

शिव रुद्र अभिषेक महत्व व लाभ

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 रुद्र अर्थात भूतभावन शिव का अभिषेक। शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही 'रुद्र' कहा जाता है, क्योंकि रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानी कि भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं।  हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारी कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।  रुद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका अर्थात सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा हैं। हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ क...

योगिनी एकादशी

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योगिनी एकादशी धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि भगवन, मैंने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के व्रत का माहात्म्य सुना। अब कृपया आषाढ़ कृष्ण एकादशी की कथा सुनाइए। इसका नाम क्या है? माहात्म्य क्या है? यह भी बताइए। श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है। यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। मैं तुमसे पुराणों में वर्णन की हुई कथा कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिव भक्त था और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था। हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद तथा रमण करने लगा। इधर राजा उसकी दोपहर तक राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया। सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी ...